जुनैद पारेख की रिपोर्ट जिला कोंडागांव

एक्रिप जनजातीय उप योजना अंतर्गत किसानों को दिया गया प्रशिक्षण प्रशिक्षण में चारा फसलें, उपयोगिता एवं पशुपालन की बताई गई विधि

कोंडागांव, 2 मार्च 2026 अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना “चारा फसलें एवं उपयोगिता” जनजातीय उप योजना अंतर्गत कृषि विज्ञान केंद्र, पूर्वी बोरगांव कोंडागांव में एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया। प्रशिक्षण का उद्देश्य किसानों को उन्नत चारा उत्पादन, पशुधन प्रबंधन तथा समन्वित कृषि प्रणाली के माध्यम से आय वृद्धि के लिए जागरूक करना रहा। प्रशिक्षण में जिले के कृषकों, जनप्रतिनिधियों एवं कृषि विशेषज्ञों की सक्रिय सहभागिता रही।कार्यक्रम की शुरुआत कृषि विज्ञान केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख द्वारा कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए की गई। उन्होंने कहा कि पशुधन भारतीय कृषि व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। कृषि कार्यप्रणाली को सुदृढ़ बनाने तथा दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक चारा प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। गुणवत्तापूर्ण चारा फसलें अपनाकर किसान श्वेत क्रांति के लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने किसानों को समन्वित कृषि प्रणाली अपनाकर स्थायी आय सुनिश्चित करने की सलाह दी।कार्यक्रम के मुख्य अतिथि नगर पंचायत फरसगांव के अध्यक्ष प्रशांत पात्र ने अपने संबोधन में कहा कि कृषि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और भारत एक कृषि प्रधान राष्ट्र है। उन्होंने किसानों से राज्य एवं केन्द्र सरकार द्वारा संचालित कृषि योजनाओं का लाभ लेकर आधुनिक एवं उन्नत कृषि तकनीकों को अपनाने का आह्वान किया।अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के परियोजना प्रभारी डॉ. संतोष झा, कृषि महाविद्यालय, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर ने बताया कि पशुधन आधारित आय में वृद्धि हेतु चारा फसलों की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने किसानों को चारा उत्पादन, पशुपालन तथा समन्वित कृषि प्रणाली अपनाकर अतिरिक्त आय अर्जित करने के लिए प्रेरित किया। साथ ही युवाओं से कृषि विज्ञान केन्द्र से सतत संपर्क बनाए रखने का आग्रह किया, ताकि आधुनिक कृषि तकनीकों के माध्यम से रोजगार एवं आजीविका के अवसर बढ़ाए जा सकें।विशिष्ट अतिथि जनपद अध्यक्ष श्री मानकू राम नेताम ने किसानों को विभागीय योजनाओं का लाभ उठाने तथा वैज्ञानिकों से निरंतर तकनीकी मार्गदर्शन प्राप्त करने की सलाह दी। कार्यक्रम में श्री तरुण साना ने किसानों को बटेर पालन एवं बतख पालन जैसे वैकल्पिक पशुपालन व्यवसाय अपनाने पर जोर दिया। वहीं श्री प्रवीर बदेशा ने जल संकट एवं रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों पर प्रकाश डालते हुए किसानों को जैविक एवं प्राकृतिक खेती की ओर अग्रसर होने के लिए प्रेरित किया।कार्यक्रम के अंत में जनजातीय उप योजना अंतर्गत 20 चयनित कृषकों को उन्नत नस्ल की खाकी कैम्पबेल बतख के चूजे निःशुल्क वितरित किए गए। इस अवसर पर जिला उपाध्यक्ष सुकलाल मरकाम, कृषि स्थायी समिति की अध्यक्ष श्रीमती लीलावती नेताम, उपाध्यक्ष एवं नायब तहसीलदार सुश्री निधि एस. नेताम सहित 12 जनप्रतिनिधि तथा कुल 96 किसानों ने प्रशिक्षण में भाग लेकर लाभ प्राप्त किया। डॉ. विप्लव चौधरी, मृदा विशेषज्ञ ने किसानों को समन्वित कृषि प्रणाली तथा चारा फसलों में मिट्टी की उपयोगिता के संबंध में विस्तारपूर्वक जानकारी दी। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम किसानों के लिए ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक सिद्ध हुआ, जिससे क्षेत्र में आधुनिक कृषि, पशुपालन एवं टिकाऊ खेती को नई दिशा मिलने की उम्मीद व्यक्त की गई।कम खर्च में अधिक लाभ डॉ. हितेश कुमार मिश्राखाकी कैम्पबेल बतख की नस्ल मूल रूप से इंग्लैंड की है। खाकी कैम्पबेल बतख किसानों के लिए अत्यंत उपयोगी मानी जाती है क्योंकि यह कम खर्च में अधिक लाभ देती है। यह नस्ल वर्ष में लगभग 250–300 अंडे देती है, जिससे किसानों को नियमित आय प्राप्त होती है। इसका पालन आसान है और यह खेतों, तालाबों तथा खुले वातावरण में अच्छी तरह रह सकती है। इसका भोजन स्थानीय अनाज, घास और कीड़े-मकोड़ों से पूरा हो जाता है, जिससे चारे का खर्च कम रहता है। अंडे और मांस दोनों की बाजार में अच्छी मांग होने से किसानों को अतिरिक्त आमदनी मिलती है। छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए यह कम निवेश में लाभदायक पशुपालन का एक अच्छा विकल्प है तथा यह नस्ल विशेष रूप से अधिक अंडा उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।


